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12 जून 1975 की सुबह इलाहाबाद हाई कोर्ट के कक्ष संख्या 15 में न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने फैसला सुनाया। 238 पृष्ठों के निर्णय में अदालत ने 14 आरोपों में से 12 को खारिज कर दिया, लेकिन दो आरोपों को सही माना। पहला आरोप इंदिरा गांधी के निजी सचिव रहे यशपाल कपूर ने औपचारिक रूप से सरकारी पद छोड़ने से पहले ही उनके चुनाव एजेंट के रूप में काम करना शुरू कर दिया था। दूसरा आरोप उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों ने चुनावी सभाओं के लिए मंच, बिजली और अन्य व्यवस्थाएं उपलब्ध कराईं। अदालत ने माना कि यह सरकारी मशीनरी का चुनावी उपयोग था, जो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 का उल्लंघन था। अदालत ने उनके 1971 के चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया और उन्हें छह वर्षों तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य ठहरा दिया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में अपील के लिए 20 दिन का समय दिया गया। देश में पहली बार किसी मौजूदा प्रधानमंत्री का चुनाव अदालत ने रद्द किया था। इससे सरकार की वैधता पर सवाल उठने लगे।
फैसले के अगले ही दिन विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति भवन तक मार्च किया और इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग की। उनका तर्क था कि जब चुनाव अवैध घोषित हो चुका है तो नैतिक रूप से प्रधानमंत्री पद पर बने रहना उचित नहीं है। प्रसिद्ध भारतीय इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा इंडिया आफ्टर नेहरू में लिखते हैं कि कांग्रेस ने इंदिरा गांधी के समर्थन में व्यापक राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन शुरू कर दिया। हरियाणा के तत्कलीन मुख्यमंत्री बंसीलाल बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों को दिल्ली लाने लगे, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि पार्टी और जनता का बड़ा हिस्सा अब भी प्रधानमंत्री के साथ है। उनके समर्थन में नारे लगाए गए, जबकि इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश जगमोहनलाल सिन्हा के पुतले भी जलाए गए।
गुहा ने बताया कि इस दौरान इंदिरा गांधी कई बार बाहर आकर समर्थकों को संबोधित करती रहीं। उन्होंने आरोप लगाया कि देश की कुछ राजनीतिक ताकतें विदेशी शक्तियों के साथ मिलकर उनकी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रही हैं और उनके विरोधियों के पास अपार संसाधन उपलब्ध हैं। मामला कानूनी विवाद से आगे बढ़कर अस्तित्व की राजनीतिक लड़ाई बन गया।
गुहा बताते हैं कि इस शक्ति प्रदर्शन का चरम 20 जून 1975 को देखने को मिला, जब दिल्ली के बोट क्लब मैदान में इंदिरा गांधी ने एक विशाल रैली को संबोधित किया। अपने दोनों बेटों और बहू सोनिया गांधी की मौजूदगी में उन्होंने नेहरू-गांधी परिवार की सार्वजनिक सेवा की विरासत का उल्लेख किया और कहा कि वह अपनी अंतिम सांस तक देश की सेवा करती रहेंगी।
कांग्रेस के भीतर चर्चा शुरू हुई कि अगर सुप्रीम कोर्ट भी हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखता है तो आगे क्या होगा। कुछ नेताओं ने अस्थायी इस्तीफे की सलाह दी, लेकिन इंदिरा गांधी इसके लिए तैयार नहीं दिखीं। सत्ता के भीतर असुरक्षा और अनिश्चितता बढ़ने लगी।
इंदिरा गांधी की अपील पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई। पूरे देश की नजर अदालत पर थी। अब सबको सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश का इंतजार था।
न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर ने इंदिरा गांधी को सीमित राहत दी। उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की अनुमति मिली, लेकिन सांसद के रूप में मतदान करने और वेतन लेने पर रोक लगा दी गई। यानी उन्हें पूरी राहत नहीं मिली थी और उनका राजनीतिक भविष्य अब भी सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय पर निर्भर था। दिलचस्प बात यह थी कि न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने भी अपने फैसले में संकेत दिया था कि जिन चुनावी उल्लंघनों के आधार पर उन्होंने फैसला सुनाया, वे कानून में वर्णित सबसे गंभीर चुनावी अपराधों की श्रेणी में नहीं आते। रामचंद्र गुहा बताते हैं कि इसी बीच कांग्रेस और सरकार के भीतर यह चर्चा शुरू हुई कि संकट को टालने के लिए इंदिरा गांधी अस्थायी रूप से इस्तीफा दे सकती हैं। कुछ नेताओं ने सुझाव दिया कि मामले का अंतिम फैसला आने तक वरिष्ठ कांग्रेस नेता जगजीवन राम को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है। लेकिन इंदिरा गांधी इस विकल्प के लिए तैयार नहीं हुईं और राजनीतिक संकट लगातार गहराता गया। इतिहासकार ग्यान प्रकाश अपनी पुस्तक Emergency Chronicles में लिखते हैं कि इंदिरा गांधी को यह विश्वास नहीं था कि अगर वह अस्थायी रूप से प्रधानमंत्री पद छोड़ती हैं तो बाद में आसानी से सत्ता में लौट पाएंगी। प्रकाश के अनुसार, उन्हें लगने लगा था कि उनके खिलाफ एक व्यापक राजनीतिक साजिश चल रही है। वह आशंकित थीं कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन उनके विरोधियों को समर्थन दे रहे हैं। इस संदर्भ में वह अक्सर चिली के राष्ट्रपति सल्वाडोर अलेंदे के तख्तापलट का उदाहरण देती थीं। ग्यान प्रकाश के मुताबिक, ऐसे समय में उनके पुत्र संजय गांधी, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे, हरियाणा के मुख्यमंत्री बंसीलाल, कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता लगातार उन्हें पद पर बने रहने की सलाह दे रहे थे।
जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल रैली को संबोधित किया। उन्होंने इंदिरा गांधी से इस्तीफे की मांग दोहराई और 29 जून से राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करने की घोषणा की। जेपी ने पुलिस और सेना से भी संविधान और नैतिकता के अनुरूप काम करने की अपील की।
प्रधानमंत्री के करीबी सलाहकारों ने स्थिति की समीक्षा की। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने आंतरिक आपातकाल लगाने का कानूनी मसौदा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की सिफारिश भेजी गई।
राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री की सिफारिश पर हस्ताक्षर कर दिए और देश में "आंतरिक अशांति" (Internal Disturbance) के आधार पर आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी।
इतिहासकार रामचंद्र गुहा की किताब के अनुसार, आपातकाल लागू होने के बाद इंदिरा गांधी ने देश और विदेश में इसे उचित ठहराने की व्यापक कोशिश की। उन्होंने अपनी मित्र और कलाकार पुपुल जयकर को लिखे एक संदेश में कहा कि बढ़ती हिंसा, नफरत और गलत सूचनाओं को रोकने के लिए आपातकाल आवश्यक था। उन्होंने दावा किया कि केवल लगभग 900 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और अधिकांश को जेलों में नहीं बल्कि आरामदायक स्थानों पर रखा गया है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि देश में शांति और अमन-चैन का माहौल है व आपातकाल का उद्देश्य देश को सामान्य लोकतांत्रिक गतिविधियों की ओर वापस ले जाना है। हालांकि गुहा लिखते हैं कि वास्तविकता इससे अलग थी। देशभर में पुलिस विपक्षी नेताओं, छात्र कार्यकर्ताओं, मजदूर संगठनों और कांग्रेस विरोधी समूहों से जुड़े लोगों को गिरफ्तार कर रही थी। जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई जैसे बड़े नेताओं को हिरासत में लिया गया, जबकि हजारों लोगों को मीसा (MISA) कानून के तहत बिना मुकदमे जेलों में बंद कर दिया गया। गुहा के अनुसार, गिरफ्तार लोगों की संख्या इंदिरा गांधी द्वारा बताए गए आंकड़ों से कहीं अधिक थी। गुहा बताते हैं कि आपातकाल के शुरुआती महीनों में इंदिरा गांधी ने विदेशी मीडिया को कई साक्षात्कार दिए। उन्होंने लंदन के संडे टाइम्स से कहा कि आपातकाल सत्ता बचाने के लिए नहीं बल्कि जयप्रकाश नारायण द्वारा पैदा की गई कथित असंवैधानिक चुनौती का जवाब था। उन्होंने दावा किया कि देश को अव्यवस्था और विघटन से बचाने व आर्थिक कार्यक्रमों को लागू करने के लिए यह कदम उठाना पड़ा। Saturday Review को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि आपातकाल लोकतंत्र को खत्म करने के लिए नहीं बल्कि उसकी रक्षा के लिए लगाया गया है। उन्होंने पश्चिमी मीडिया की आलोचना करते हुए कहा कि भारत की तुलना पाकिस्तान और चीन जैसे अधिनायकवादी देशों से करना अनुचित है। रामचंद्र गुहा के अनुसार, आपातकाल के दौरान सरकार ने अनुशासन और नैतिकता को प्रमुख नारे के रूप में प्रचारित किया। सरकारी प्रचार तंत्र ने “अनुशासन ही देश को महान बनाता है”, “काम ज्यादा, बातें कम” और ''स्वदेशी खरीदें, भारतीय बनें'' जैसे नारे पूरे देश में फैलाए। इसके साथ ही इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व को मजबूत नेतृत्व के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया। बड़े-बड़े होर्डिंगों और सरकारी प्रचार में उन्हें व्यवस्था और स्थिरता की गारंटी के रूप में दिखाया गया।
Source: https://www.amarujala.com/india-news/the-judgment-that-led-to-the-emergency-why-the-allahabad-high-court-verdict-still-matters-2026-06-12