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ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त हों और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करके उसे तैयार करें।
हाथ में जल और पुष्प लेकर निर्जला एकादशी व्रत तथा भगवान विष्णु की पूजा का संकल्प लें।
एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर उसे फूलों से सजाएं और भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
पंचामृत से भगवान विष्णु का अभिषेक करें।
श्रीहरि को पीले पुष्प, चंदन, अक्षत, हल्दी, तुलसी दल, धूप, दीप, फल, पान, सुपारी और वस्त्र अर्पित करें।
श्रद्धापूर्वक विष्णु सहस्रनाम और विष्णु चालीसा का पाठ करें।
निर्जला एकादशी व्रत कथा का श्रवण या पाठ करें।
कपूर या घी के दीपक से भगवान विष्णु की आरती करें।
पूजा पूर्ण होने पर जल से भरा मिट्टी का कलश दान करें।
पूरे दिन निराहार रहकर व्रत का पालन करें और भजन-कीर्तन तथा भगवान के स्मरण में समय बिताएं।
सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में दीप प्रज्वलित कर पुनः विष्णु पूजा करें।
रात्रि में यथाशक्ति जागरण कर भगवान का भजन करें।
अगले दिन प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर पूजा करें।
पद्म पुराण में इस व्रत से जुड़ी एक रोचक कथा मिलती है। कहा जाता है कि एक बार पांडव पुत्र भीमसेन ने महर्षि वेद व्यास के सामने अपनी एक चिंता रखी। भीम ने बताया कि उनके पेट में वृक नाम की एक अग्नि हमेशा जलती रहती है, जिसकी वजह से उन्हें हर समय तेज भूख का अनुभव होता है। इसी कारण वे जीवन में कभी कोई व्रत नहीं रख पाए। उन्होंने व्यासजी से प्रार्थना की कि उन्हें कोई ऐसा सरल उपाय बताया जाए, जिसे एक बार करने से ही उनका कल्याण हो सके और उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हो सके। इस पर वेद व्यास ने भीम को ज्येष्ठ मास की एकादशी तिथि पर जल त्याग कर व्रत रखने की सलाह दी। चूंकि ज्येष्ठ का महीना सबसे अधिक गर्मी वाला होता है, इस दौरान बिना पानी के रहना बेहद मुश्किल काम है, और इसी कठिनाई के चलते इस व्रत को सबसे कठिन एकादशियों में गिना जाता है। व्यासजी ने यह भी कहा कि सिर्फ इस एक एकादशी का व्रत करने से ही साल भर में आने वाली समस्त एकादशियों के व्रत का फल अपने आप प्राप्त हो जाता है। इसी पौराणिक मान्यता के कारण भीम के नाम पर इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है।
Source: https://www.amarujala.com/live/spirituality/festivals/nirjala-ekadashi-vrat-2026-live-puja-vidhi-vrat-parana-time-snan-daan-upay-and-katha-in-hindi-2026-06-25