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माधुरी दीक्षित को पर्दे पर देखकर आज भी एक अपनापन सा महसूस होता है - कभी 'हम आपके हैं कौन' की निशा, कभी 'दिल तो पागल है' की पूजा और कभी 'धक-धक गर्ल'। लेकिन 'मां बहन' में वह उस अंदाज में नजर आती हैं, जिसमें उन्हें हमने बहुत कम देखा है। यहां वह न किसी प्रेम कहानी का हिस्सा हैं, न ही किसी आदर्श मां का किरदार निभा रही हैं। यहां वो एक विधवा महिला के किरदार में हैं, जो अपने हिसाब से जिंदगी जीती हैं और शायद यही बात लोगों को सबसे ज्यादा खटकती है। जानते हैं कैसी है सुरेश त्रिवेणी की ये डार्क-कॉमेडी फिल्म?
कहानी रेखा (माधुरी दीक्षित) अपनी सोसायटी में चर्चा का विषय बनी रहती है। विधवा हैं, सजती-संवरती हैं, खुलकर बोलती हैं और अपने हिसाब से जिंदगी जीती हैं। यही बात आसपास के लोगों को पसंद नहीं आती। लोगों ने उनके बारे में अपनी-अपनी राय बना रखी है।
दूसरी तरफ उनकी बड़ी बेटी जया (तृप्ति डिमरी) अपनी परेशानियों में उलझी हुई है। वह मां बनना चाहती है। आईवीएफ करवाना है। इसके लिए साढ़े पांच लाख रुपये चाहिए। आर्थिक दबाव है और निजी जिंदगी की उलझनें अलग। इसी बीच रेखा का घबराया हुआ फोन आता है। जया और उसकी बहन सुषमा (धारणा दुर्गा) तुरंत मां के घर पहुंचती हैं। घर के अंदर का नजारा देखकर दोनों के होश उड़ जाते हैं। कमरे में गुप्ताजी (रवि किशन) पड़े हैं। उन्हें देखकर यही लगता है कि उनकी मौत हो चुकी है।
रेखा का कहना है कि यह एक हादसा है। लेकिन मामला इतना सीधा नहीं है। पुलिस को खबर करने के बजाय मां और बेटियां पहले खुद ही स्थिति संभालने की कोशिश करती हैं। मुसीबत तब और बढ़ जाती है जब सामने गुप्ताजी के घर में उनकी बेटी की सगाई की रस्में चल रही होती हैं। मेहमानों का आना-जाना लगा हुआ है। ऐसे में एक छोटी सी गलती भी बड़ा बवाल खड़ा कर सकती है। इसके बाद झूठ, गलतफहमियां और लगातार बिगड़ते हालात कहानी को आगे बढ़ाते हैं।
अभिनय फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके कलाकार हैं। माधुरी दीक्षित लंबे समय बाद ऐसे किरदार में नजर आई हैं, जहां उन्हें खुलकर खेलने का मौका मिला है। रेखा के किरदार में वह मजेदार भी हैं, भावुक भी और कई जगह चौंकाती भी हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि वह किरदार को जरूरत से ज्यादा नाटकीय नहीं बनातीं। फिल्म के कई यादगार सीन्स उनके हिस्से आए हैं और वह उनमें पूरी तरह असर छोड़ती हैं।
तृप्ति डिमरी फिल्म की सबसे प्रभावशाली परफॉर्मेंस देती हैं। जया के किरदार में उनकी बेचैनी, झुंझलाहट और थकान लगातार महसूस होती है। कई सीन्स में वह बिना ज्यादा डायलाग के भी अपने किरदार की मनःस्थिति दर्शा देती हैं। फिल्म का इमोशनल पक्ष काफी हद तक उनके कंधों पर टिका है और वह इसे अच्छी तरह संभालती हैं।
धारणा दुर्गा भी अच्छा काम करती हैं और कहानी में जरूरी एनर्जी लेकर आती हैं। मां और बहन के बीच फंसे उनके किरदार में कई मजेदार पल हैं।
रवि किशन भी प्रभाव छोड़ते हैं। उनका किरदार कहानी के अहम मोड़ों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परेश रावल बहुत ही छोटे रोल में हैं, उनका किरदार थोड़ा अधूरा सा लगता है। गीतांजलि कुलकर्णी हमेशा की तरह भरोसेमंद हैं। अरुणोदय सिंह, जतिन सरना और बाकी कलाकार भी अपने हिस्से का काम ईमानदारी से करते हैं।
निर्देशन सुरेश त्रिवेणी की सबसे बड़ी खूबी उनके किरदार हैं। फिल्म में भी वह ऐसे लोगों की कहानी कहते हैं जो असली लगते हैं। रेखा, जया और सुषमा सिर्फ कहानी को आगे बढ़ाने वाले किरदार नहीं हैं, बल्कि अपनी-अपनी परेशानियों और कमजोरियों के साथ नजर आते हैं।
फिल्म की एक दिलचस्प बात यह भी है कि रेखा के किरदार के जरिए समाज की सोच पर हल्का-सा तंज किया गया है। एक विधवा महिला जो अपने हिसाब से जिंदगी जीती है, स्लीवलेस ब्लाउज पहनती है और किसी की परवाह नहीं करती, वही पूरी कॉलोनी की नजर में समस्या बन जाती है। फिल्म बिना भाषण दिए इस सोच को सामने रखती है।
डार्क ह्यूमर भी कई जगह अच्छा काम करता है। खासकर वे सीन्स जहां तीनों महिलाएं हालात संभालने की कोशिश में उन्हें और उलझा देती हैं। इन स्थितियों से कई मजेदार पल निकलते हैं।
स्क्रीनप्ले हालांकि फिल्म का स्क्रीनप्ले हर जगह एक जैसा मजबूत नहीं है। इंटरवल के बाद रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ती है, कुछ हिस्से जरूरत से ज्यादा खिंचे हुए लगते हैं।
फिल्म समाज, रिश्तों और महिलाओं को लेकर बनी धारणाओं पर कई बातें छेड़ती है, लेकिन उनमें से कुछ को और गहराई से दिखाया जा सकता था। यही वजह है कि अच्छे विचार होने के बावजूद फिल्म हर जगह उतना असर नहीं छोड़ पाती, जितनी उम्मीद बनाती है।
देखें या नहीं? 'मां बहन' परफेक्ट फिल्म नहीं है, लेकिन मनोरंजन करने में सफल रहती है। माधुरी दीक्षित और तृप्ति डिमरी इसकी सबसे बड़ी ताकत हैं और डार्क कॉमेडी का अंदाज फिल्म को अलग पहचान देता है। दोनों कई जगह उन हिस्सों को भी संभाल लेती हैं जहां पटकथा थोड़ी कमजोर पड़ती है।
अगर आपको किरदारों पर आधारित कहानियां और डार्क कॉमेडी पसंद है, तो 'मां बहन' आपको निराश नहीं करेगी। कुछ कमियों के बावजूद यह उन फिल्मों में शामिल है जो भीड़ से अलग नजर आती हैं और अंत तक आपका ध्यान बनाए रखती हैं।
Source: https://www.amarujala.com/entertainment/movie-review/maa-behen-movie-review-in-hindi-madhuri-dixit-tripti-dimri-ravi-kishan-and-suresh-triveni-dark-comedy-film-2026-06-04