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भारत में नकली और घटिया दवाओं की समस्या लंबे समय से चिंता का विषय रही है। कई बार मरीजों के लिए यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि जो दवा वे खरीद रहे हैं, वह असली है या नकली। इसी समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने दवाओं की ट्रैकिंग और सत्यापन व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए क्यूआर कोड लगाने का फैसला किया है। इसके साथ ही आयात होने वाली दवाओं के शेल्फ लाइफ नियमों में भी बदलाव का प्रस्ताव रखा गया है।

हाल ही में नकली इंजेक्शन के कारण राजस्थान के कोटा में प्रसूताओं की मौत हो गई। जांच के दौरान दवा के नमूने गुणवत्ता परीक्षण में फेल पाए गए और उनमें ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन में ऑक्सीटोसिन की मात्रा शून्य मिली। जांच में पाया गया कि फर्म ने जितनी दवाएं खरीदी थीं, उससे अधिक इंजेक्शन बाजार में बेचे गए।

एनडीपीएस एक्ट, 1985 के तहत आने वाली सभी नारकोटिक और साइकोट्रॉपिक दवाएं

इन सभी दवाओं पर अब क्यूआर कोड या बार कोड लगाना अनिवार्य होगा।

अनुसूची एच2 ड्रग्स रूल्स, 1945 का वह प्रावधान है जिसके तहत कुछ दवाओं की पैकेजिंग पर क्यूआर कोड या बार कोड लगाया जाता है ताकि उनकी पहचान और पूरी सप्लाई चेन में ट्रैकिंग की जा सके। इसका उद्देश्य दवा की असलियत की जांच करना और नकली दवाओं की बिक्री रोकना है।

निर्माताओं को दवा के प्राइमरी पैकेज (जिस पैक में दवा सीधे रहती है) पर क्यूआर कोड या बार कोड लगाना होगा।

अगर वहां पर्याप्त जगह नहीं होगी तो इसे सेकेंडरी पैकेजिंग पर लगाया जाएगा।

क्यूआर कोड स्कैन करने पर दवा से जुड़ी नौ अहम जानकारियां मिलेंगी। इनमें शामल हैं

दवा में मौजूद एक्सिपिएंट्स यानी सहायक पदार्थों की जानकारी

दवा की असलियत की तुरंत जांच हो सकेगी।

पूरी सप्लाई चेन में दवा को ट्रैक किया जा सकेगा।

नकली और घटिया दवाओं की पहचान आसान होगी।

नियामक एजेंसियों की निगरानी मजबूत होगी।

मरीजों तक सुरक्षित दवाएं पहुंचाने में मदद मिलेगी।

नकली एंटीमाइक्रोबियल दवाओं पर नजर रखने से एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) से लड़ाई में भी मदद मिलेगी।

सरकार ने उद्योग को नए नियम लागू करने की तैयारी के लिए चरणबद्ध समय-सीमा तय की है। इसके तहत सभी वैक्सीन, कैंसर रोधी दवाओं और नारकोटिक व साइकोट्रॉपिक दवाओं पर क्यूआर कोड अनिवार्य करने का नियम 1 जुलाई 2027 से लागू होगा। वहीं, सभी एंटीमाइक्रोबियल दवाओं के लिए यह व्यवस्था 1 जुलाई 2028 से प्रभावी होगी। हालांकि सरकार ने दवा कंपनियों से अपील की है कि वे निर्धारित समय-सीमा का इंतजार किए बिना इन प्रावधानों को स्वेच्छा से पहले ही लागू करें, ताकि दवाओं की प्रमाणिकता, ट्रैकिंग और पारदर्शिता के लाभ जल्द मिल सकें।

क्यूआर कोड आधारित ट्रैक एंड ट्रेस व्यवस्था पहली बार 1 अगस्त 2023 से लागू की गई थी। उस समय यह नियम केवल देश के 300 सबसे अधिक बिकने वाले दवा ब्रांडों पर लागू किया गया था। इनमें डोलो, कैलपोल, कॉम्बीफ्लैम, सैरिडॉन, ऑगमेंटिन, एजिथ्राल, एलेग्रा और थायरोनॉर्म जैसी लोकप्रिय दवाएं शामिल थीं। इन दवाओं पर लगे क्यूआर कोड को स्कैन करके उपभोक्ता दवा की असलियत और उससे जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी की जांच कर सकते थे।

इन 300 दवाओं का चयन स्वास्थ्य मंत्रालय ने मार्च 2022 में शुरू किया था। इसके लिए फार्मास्यूटिकल्स विभाग को सबसे अधिक बिकने वाले दवा ब्रांडों की सूची तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी। चयन मूविंग एनुअल टर्नओवर यानी पिछले 12 महीनों की कुल बिक्री के आधार पर किया गया। इसके बाद नवंबर 2022 में ड्राफ्ट अधिसूचना जारी की गई और 1 अगस्त 2023 से यह व्यवस्था लागू कर दी गई।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने ड्रग्स रूल्स, 1945 के नियम 31 में संशोधन का मसौदा भी जारी किया है।

अभी नियम यह है कि आयात होने वाली दवा के पास भारत आने के समय उसकी कुल शेल्फ लाइफ का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बचा होना चाहिए।

सरकार अब इसे बदलकर यह प्रस्ताव लाई है कि दवा के भारत में आयात के समय उसकी कम से कम 12 महीने की शेष शेल्फ लाइफ होनी चाहिए।

हालांकि यह प्रस्ताव जैविक उत्पादों (बायोलॉजिकल प्रोडक्ट्स) और रेडियोफार्मास्यूटिकल दवाओं पर लागू नहीं होगा। इन पर पहले वाला 60 प्रतिशत वाला नियम ही जारी रहेगा।

दवाओं की सप्लाई चेन अधिक प्रभावी बनेगी।

कंपनियां अपने स्टॉक का बेहतर उपयोग कर सकेंगी।

मरीजों को पर्याप्त शेष शेल्फ लाइफ वाली दवाएं मिलती रहेंगी।

शेल्फ लाइफ का मतलब किसी दवा के बनने की तारीख से लेकर उसकी एक्सपायरी डेट तक का कुल समय होता है, यानी वह अवधि जिसके दौरान दवा सुरक्षित, प्रभावी और उपयोग योग्य रहती है। उदाहरण के लिए, अगर कोई दवा जनवरी 2026 में बनी है और उसकी एक्सपायरी जनवरी 2028 है, तो उसकी कुल शेल्फ लाइफ दो वर्ष होगी।

Source: https://www.amarujala.com/india-news/how-will-qr-codes-on-medicine-packs-change-things-and-why-did-the-government-revise-the-old-rules-2026-06-26