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जनसंख्या वृद्धि को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार चिंता जताते रहे हैं। भारत उन देशों में से एक रहा है जहां सबसे तेजी से जनसंख्या बढ़ती जा रही थी, हालांकि अब ये तस्वीर काफी बदलती दिख रही है। हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार भारत में फर्टिलिटी रेट अब रिप्लेसमेंट लेवल से भी नीचे चली गई है। इसका मतलब है कि अब औसतन प्रति महिला से उतने बच्चों का भी जन्म नहीं हो रहा जितने जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए जरूरी होते हैं।
भारत की कुल प्रजनन दर में गिरावट पहले उस रिपोर्ट के बारे में जान लीजिए जिसमें नए आंकड़ों को लेकर इन दिनों खूब चर्चा है। India’s fertility rate has fallen below replacement for the first time in the country’s history, declining from a TFR of 2.3 to 1.9 in just a decade. Delhi’s fertility rate now sits at 1.2, lower than Finland’s. Follow: @AFpost pic.twitter.com/4uR8DVscvw — AF Post (@AFpost) June 6, 2026 सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) की स्टैटिस्टिकल रिपोर्ट के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर घटकर 1.9 हो गई है। रिप्लेसमेंट लेवल फर्टिलिटी रेट का अनुमान 2.1 है। रिप्लेसमेंट लेवल वह स्तर है जिस पर कोई आबादी बिना किसी माइग्रेशन के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में खुद को बनाए रख सकती है।
India’s fertility rate has fallen below replacement for the first time in the country’s history, declining from a TFR of 2.3 to 1.9 in just a decade. Delhi’s fertility rate now sits at 1.2, lower than Finland’s. Follow: @AFpost pic.twitter.com/4uR8DVscvw — AF Post (@AFpost) June 6, 2026
India’s fertility rate has fallen below replacement for the first time in the country’s history, declining from a TFR of 2.3 to 1.9 in just a decade. Delhi’s fertility rate now sits at 1.2, lower than Finland’s. Follow: @AFpost pic.twitter.com/4uR8DVscvw
यह गिरावट बदलते सामाजिक और आर्थिक रुझानों को दिखाती है।
शिक्षा तक बेहतर पहुंच, शहरीकरण, बढ़ती आय और वर्कफोर्स में महिलाओं की ज्यादा भागीदारी का इसमें बड़ा योगदान माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कम प्रजनन दर से कई फायदे हो सकते हैं, लेकिन यह नीति-निर्माताओं के लिए नई चुनौतियां भी पेश करती है।
क्या हो सकते हैं इसके परिणाम? रिप्लेसमेंट लेवल से कम फर्टिलिटी रेट का मतलब है कि आने वाली पीढ़ियां पिछली पीढ़ियों के मुकाबले छोटी हो सकती हैं। समय के साथ, इससे आबादी बढ़ने की रफ्तार धीमी हो सकती है। एक समय के बाद आबादी स्थिर हो सकती है या उसमें कमी भी आ सकती है। इसका एक सबसे अहम नतीजा बुजुर्गों की आबादी में बढ़ोतरी होने का भी है। जैसे-जैसे कम बच्चे पैदा होंगे, आबादी में बुज़ुर्गों का हिस्सा बढ़ेगा। इससे हेल्थकेयर, पेंशन और बुज़ुर्गों की देखभाल की सेवाओं पर ज्यादा खर्च हो सकता है, साथ ही सोशल सिक्योरिटी सिस्टम पर भी दबाव बढ़ सकता है।
जन्म दर कम होने से भविष्य में लेबर मार्केट यानी देश की उत्पादकता दर पर भी असर पड़ सकता है।
वर्कफोर्स में युवाओं की कमी आने से भारत को काम करने वालों की कमी हो सकती है। इससे आर्थिक वृद्धि भी कम हो सकती है।
क्या हैं फर्टिलिटी रेट कम होने के कारण देश में गिरते प्रजनन दर के लिए विशेषज्ञ कई कारणों को जिम्मेदार मान रहे हैं।
भारत में तेजी से हो रहे शहरीकरण ने लोगों की जीवनशैली को पूरी तरह बदल दिया है। गांवों की तुलना में शहरों में रहने का खर्च काफी अधिक होता है, जिससे परिवार छोटे रखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। शहरों में रहने वाले लोग सीमित संसाधनों के एक या दो बच्चों तक ही सीमित रहना पसंद करते हैं।
महिलाओं की शिक्षा और रोजगार में बढ़ोतरी ने भी फर्टिलिटी रेट पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला है। महिलाएं उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं और करियर को प्राथमिकता दे रही हैं। इसके कारण शादी और बच्चे पैदा करने की उम्र पहले की तुलना में काफी आगे बढ़ गई है। शोध के अनुसार, जैसे-जैसे महिलाओं की शिक्षा और आर्थिक भागीदारी बढ़ती है, जन्म दर सामान्यतः घटती है।
महंगाई और जीवन-यापन की बढ़ती लागत ने भी फर्टिलिटी रेट को प्रभावित किया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और बच्चों की परवरिश का खर्च पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ा है। मध्यम वर्ग के परिवार अब एक या दो बच्चों की अच्छी परवरिश को प्राथमिकता देते हैं।
आज के समय में लोग पहले की तुलना में देर से शादी कर रहे हैं। करियर बनाने और आर्थिक स्थिरता हासिल करने की इच्छा के कारण विवाह की उम्र बढ़ गई है। इसका सीधा असर प्रजनन क्षमता और बच्चों की संख्या पर पड़ता है
इसके अलावा भारत में परिवार नियोजन और गर्भनिरोधक साधनों की उपलब्धता और जागरूकता में काफी सुधार हुआ है। सरकारी योजनाओं और स्वास्थ्य कार्यक्रमों के कारण लोग अब अधिक जिम्मेदारी के साथ परिवार की योजना बना रहे हैं। अनचाहे गर्भधारण में कमी आई है और लोग पहले से तय कर रहे हैं कि उन्हें कितने बच्चे चाहिए।
कहीं चीन जैसी न हो जाए भारत की स्थिति भारत में फर्टिलिटी रेट में गिरावट के बाद अब एक चिंता ये भी है कि कहीं देश की स्थिति चीन के जैसी न हो जाए? जनवरी में प्रकाशित रिपोर्ट में हमने बताया था कि चीन में 1949 के बाद जन्मदर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई है। वहीं बुजर्गों की आबादी बढ़ती जा रही है। दशकों तक एक से ज्यादा बच्चे पैदा करने से रोक वाली पॉलिसी का असर यहां स्पष्ट तौर पर देखा जा रहा है। साल 2025 में चीन में 60 साल से ऊपर के लोगों की संख्या 32.3 करोड़ तक पहुंच गई, जो कुल आबादी का 23 प्रतिशत है। यह 2024 के मुकाबले एक प्रतिशत ज्यादा है, यानी चीन की आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है जबकि युवा कम होते जा रहे हैं जिसे विशेषज्ञ गंभीर संकट के तौर पर देख रहे हैं। पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ सकते हैं।
-------------- नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है। अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
Source: https://www.amarujala.com/photo-gallery/lifestyle/fitness/indias-fertility-rate-has-dropped-below-the-replacement-level-elon-musk-know-its-causes-2026-06-07