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भारत में अगर किसी कलाकार को छोटा सा भी हॉलीवुड प्रोजेक्ट मिल जाए, तो उसे बड़ी कामयाबी मान लिया जाता है। लेकिन मनोज बाजपेयी की सोच इससे बिल्कुल अलग है। उनका मानना है कि हम आज भी इस सोच से बाहर नहीं निकल पाए हैं कि पश्चिम जो कर रहा है, वही सबसे बेहतर है।
'हम आज भी कॉलोनियल मानसिकता से बाहर नहीं आए' अमर उजाला डिजिटल से बातचीत में मनोज बाजपेयी ने कहा, ‘देखिए, वो एक मानसिकता है, जिसका शिकार हम हमेशा से रहे हैं। एक तरह की कॉलोनियल मानसिकता, जिसे हम आज तक पूरी तरह छोड़ नहीं पाए हैं। हमें हमेशा लगता है कि जो वो कर रहे हैं, वही बेहतर है...वही बड़ा है। हम लगातार उसी से मुकाबला करने की कोशिश करते रहते हैं।’ 'हॉलीवुड फिल्म मिलना ही बड़ी कामयाबी नहीं' आज इंडस्ट्री में कई कलाकार विदेशी प्रोजेक्ट को बड़ी सफलता मानते हैं। लेकिन मनोज बाजपेयी ने बताया कि उन्होंने कई बार हॉलीवुड के ऑफर ठुकरा दिए, क्योंकि काम उन्हें पसंद नहीं आया। उन्होंने कहा, ‘बहुत बार हुआ है। अच्छे रोल्स नहीं आते हैं। और जब अच्छी फिल्में नहीं बन रही होती हैं, तो उसी तरह के लोग संपर्क करते हैं जो वहां भी बहुत अच्छा नहीं कर रहे होते। कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स में बात बनते-बनते रह गई, लेकिन उसके बारे में क्या बात करनी।’
अगर कभी किताब लिखी, तो इसी पर लिखूंगा मनोज बाजपेयी का कहना है कि अगर कभी उन्हें कुछ गंभीरता से लिखने का मौका मिला, तो वह भारतीय कलाकारों पर हॉलीवुड के असर को ही विषय बनाएंगे। उन्होंने कहा, ‘अगर कभी शिद्दत के साथ कुछ लिखना चाहूंगा, तो मैं इस बात पर लिखना चाहूंगा कि एक भारतीय अभिनेता कैसे पूरी तरह अमेरिकी या हॉलीवुड से प्रभावित एक्टिंग के असर से बच सकता है। क्योंकि हमारे यहां जो गंभीर क्रिटिक्स हैं, वो भी अक्सर अच्छी एक्टिंग का रेफरेंस हॉलीवुड को ही मानते हैं। जैसे अच्छी एक्टिंग का एक ही पैमाना हो। लेकिन ऐसा नहीं है। एक्टिंग के बहुत सारे रास्ते हैं... बहुत सारे ट्रैक हैं, और उनमें से किसी एक को ही अंतिम सच नहीं माना जा सकता।’
हमारे यहां एक्टिंग को लेकर सोच गलत है मनोज बाजपेयी का मानना है कि भारत में अक्सर अंग्रेजी फिल्मों जैसी एक्टिंग को ही अच्छा अभिनय समझ लिया जाता है, जबकि यहां के लोगों का तरीका और व्यवहार बिल्कुल अलग है। उन्होंने कहा, ‘मेरी दिक्कत ये है कि एक्टिंग के नाम पर ज्यादातर लोग अंग्रेजी फिल्मों में जो देखते हैं, उसी को अच्छी एक्टिंग मान लेते हैं। लेकिन भारतीय अभिनय इसलिए अलग है क्योंकि यहां के लोगों के एक्सप्रेशन अलग हैं, बातचीत करने का तरीका अलग है, व्यवहार अलग है।’
मेरी फिल्मों में आपको हिंदुस्तानी आदमी दिखेगा मनोज कहते हैं कि उन्होंने हमेशा कोशिश की कि उनके किरदार पूरी तरह भारतीय लगें, किसी विदेशी स्टाइल की कॉपी नहीं। उन्होंने कहा, ‘मैं लगातार इसी सोच पर काम करता रहा हूं। इसलिए अगर आप मेरी ज्यादातर फिल्में देखेंगे, तो आपको उनमें एक हिंदुस्तानी आदमी दिखाई देगा। वो ऐसा बिल्कुल नहीं लगेगा कि किसी और देश का किरदार निभाया जा रहा है और सिर्फ उसका नाम भारतीय रख दिया गया है। इसी वजह से 'सत्या', 'शूल' या खासकर 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' जैसी फिल्में इतनी खास हैं। ये बहुत खालिस भारतीय फिल्में हैं। उनके किरदार, उनके परफॉर्मेंस, उनकी भाषा, उनका व्यवहार- सब कुछ भारतीय समाज से निकलकर आता है। जब भी आप इस तरह की फिल्म बनाएंगे, तो उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिलेगी, क्योंकि उसमें अपनी अलग पहचान होगी।’
नए एक्टर्स को मनोज की सलाह नई पीढ़ी के कलाकारों को मनोज बाजपेयी ने साफ कहा कि एक्टिंग सीखने के लिए बाहर देखने की जरूरत नहीं है। सबसे पहले अपने आसपास के लोगों को समझना जरूरी है। उन्होंने कहा, ‘बिल्कुल। बेसिक ग्रामर तो आप सीख सकते हैं। उसके लिए आपको बहुत दूर जाने की जरूरत भी नहीं है। बस अपने आसपास के लोगों को देखिए, अपनी जिंदगी को देखिए। कोई भी आदमी यहां हॉलीवुड के किसी एक्टर या एक्ट्रेस की तरह बात नहीं करता। यही सबसे बुनियादी बात है। आप जिस परिवार से आते हैं, जिन लोगों के बीच बड़े हुए हैं, उनका व्यवहार देखिए। लोग एक-दूसरे से कैसे बात करते हैं, कैसे रिएक्ट करते हैं।’ आगे उन्होंने कहा, ‘चाहे वो कोई गंभीर बात कर रहे हों या बिल्कुल हल्की-फुल्की बातचीत, उनका तरीका अलग होता है। उनकी बॉडी लैंग्वेज अलग होती है, उनके एक्सप्रेशन अलग होते हैं। एक अभिनेता के तौर पर जरूरी है कि आप इन चीजों को समझें। अपने किरदार को पूरी तरह इस मिट्टी में, इस समाज में रूटेड करें। क्योंकि तभी वो किरदार सच लगेगा, तभी वो लोगों से जुड़ पाएगा।’
Source: https://www.amarujala.com/entertainment/celebs-interviews/manoj-bajpayee-exclusive-interview-governor-actor-talks-about-indian-cinema-and-hollywood-impact-on-this-2026-06-16